Citrullus Colocynthis (Garmunda)

Citrullus colocynthis, which has many common names including colocynth, bitter apple, bitter cucumber, desert gourd, sodom vine or wild gourd. It is a desert fruit and is mainly found in the Mediterranean basin and Asia, especially in countries such as Turkey. It resembles a common watermelon vine, but its fruits are bitter as well as harsh. 

It is a wild fruit and in India it is found in abundance in South Haryana as well as Rajasthan. The native name of this fruit is Garmunda, which is dominated by its medicinal properties. It has been used equally for both humans and animals. Ripe fruits are dried and stored and grinded and fed when needed. Usually it is not cultivated, it grows automatically and its most favorable period for the growth and flourishing is during summer, which coincides with the rainy season. 

Garmunda has been widely used in traditional medicine for centuries. In traditional veterinary medicine, colocynth has been used to treat skin eruptions in camels. It is also used in urinary diseases and ascites. Its leaves are similar to watermelon and the flowers are yellow. The fruit is smooth, and extremely bitter to taste. 

Recently, an investigator from the Central University of Haryana has claimed that just four days of syrup made from wild fruit “Garmunda” can lead to a complete discharge of the disease of sugar. He told that he has prepared this syrup after long research. It has been used on many people. Read More… 



सिट्रुलस कोलोसिन्थिस, जिसमें कई सामान्य नाम हैं जिनमें कोलोसिन्थ, कड़वा सेब, कड़वा खीरा, रेगिस्तानी लौकी, सोडम बेल या जंगली लौकी शामिल हैं। यह एक रेगिस्तानी फल है और मुख्य रूप से भूमध्यसागरीय बेसिन और एशिया, विशेष रूप से तुर्की जैसे देश में पाया जाता है। यह एक आम तरबूज बेल जैसा ही दिखता है, लेकिन इसके फल कड़वे होने के साथ-साथ कठोर भी होते हैं। 

यह एक जंगली फल हैं और भारत में यह फल दक्षिण हरियाना के साथ-साथ राजस्थान में बहुतायत में मिलता हैं। इस फल का देसी नाम गरमुंडा हैं, जो अपने औषधीय गुणों के कारण अपना वर्चस्व बनाए हुए हैं। इसका उपयोग मनुष्यों और पशुओं दोनों के लिए बराबर किया जाता रहा हैं। पके हुए फलों को सुखाकर और संभालकर रख लिया जाता हैं और जरुरत पड़ने पर इसको पीसकर खिलाया जाता हैं । आमतौर पर इसकी खेती नहीं होती, यह स्वतः ही उगता हैं और यह गर्मियों के दिनों में फलता और फूलता है, जो बारिश के मौसम के साथ मेल खाता है। 

गरमुंडा का उपयोग सदियों से पारंपरिक चिकित्सा में व्यापक रूप से किया जाता रहा है। पारंपरिक पशु चिकित्सा में, ऊंटों में त्वचा के फटने के उपचार के लिए कोलोसिन्थ का उपयोग किया गया है। मूत्र रोग और जलोदर में भी इसका प्रयोग किया जाता हैं। इसके पत्ते तरबूज के समान होते हैं और फूल पीले होते हैं। फल चिकना, और स्वाद में बेहद कड़वा होता है। 

हाल ही में, हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय के एक अन्वेषक ने यह दावा किया है की जंगली फल गरमुंडा से बनाए गए सिरप के मात्र चार दिन सेवन से ही शुगर की बीमारी की पूरी तरह छुट्टी हो सकती है। उन्होंने बताया कि काफी लंबे शोध के बाद उन्होंने यह सिरप तैयार किया है। काफी लोगों पर इसका प्रयोग करके देखा गया है। 


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